जब पैसे ना होने पर शाम तक मेला देखते रहे, PM रहते भी लोन लेकर खरीदी कार, नहीं मिलेगी ऐसी मिसाल

जब पैसे ना होने पर शाम तक मेला देखते रहे, PM रहते भी लोन लेकर खरीदी कार, नहीं मिलेगी ऐसी मिसाल

By: Aryan Paul
January 11, 12:01
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New Delhi:

आज देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की पुण्यतिथि है। इस मौके पर पीएम मोदी और राहुल गांधी समेत कई बड़े नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है। सादगी की मिसाल थे शास्त्री जी। पीएम मोदी ने लिखा कि शास्त्री जी की निर्दोष सेवा और साहसी नेतृत्व को आने वाली पीढ़ियों के लिए याद किया जाएगा। जानिए उनके जन्मदिन पर वो देश को क्या देकर गए-----

शास्त्री जी

2 अक्टूबर 1901 को यूपी के मुगलसराय में जन्में शास्त्री जी के पिता एक स्कूल शिक्षक थे। वो बहुत ही गरीब परिवार से थे। मात्र डेढ़ साल के थे शास्त्री जी, जब उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। उनकी मां अपने तीनों बच्चों के साथ अपने पिता के घर जाकर बस गईं। गर्मी हो या भीषण सदी, कई मील दूरी पैदल चलकर ही नंगे पांव स्कूल जाते थे शास्त्री जी। जब शास्त्री जी सिर्फ 16 साल के ही थे, तब उन्होंने देश के लिए कुछ करने की ठानी। और पढ़ाई छोड़ कर असहयोग आंदोलन में कूद गए । 1972 में लाल बहादुर ने ललिता देवी से शादी की। वह दहेज के सख्त खिलाफ थे। दहेज के नाम पर उन्होंने सिर्फ एक चरखा एवं हाथ से बुने हुए कुछ मीटर कपड़े लिए थे। 

SHASTRI JI

1946 में जब कांग्रेस सरकार का गठन हुआ, तो उन्हें उत्तर प्रदेश का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया और जल्द ही वे गृह मंत्री के पद पर भी आसीन हुए। 1951 में वे कई विभागों के केंद्रीय मंत्री भी बने, रेल मंत्री, परिवहन एवं संचार मंत्री, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री और गृह मंत्री भी बनाए गए। बता दें कि एक रेल दुर्घटना, जिसमें कई लोग मारे गए थे, उसके लिए खुद को जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था।

SHASTRI JI
नेहरू की 27 मई, 1964 को मौत हो जाने के बाद शास्त्री जी को 1964 में देश का प्रधानमन्त्री बनाया गया। उन्होंने 9 जून 1964 को भारत के प्रधान मन्त्री का पद भार ग्रहण किया। शास्त्री के शासनकाल में ही 1965 का भारत-पाक युद्ध लड़ा गया। साथ ही बता दें कि इससे तीन साल पहले ही भारत चीन से युद्ध हार चुका था। शास्त्रीजी के नेतृत्व में पाक को जो मुंह तोड़ जवाब मिला, जिसकी कभी पाक ने कल्पना भी नहीं की थी।

SHASTRI JI

1. जब पैसे ना होने के कारण मेले में ही रुक गए थे शास्त्री जी-----

एक बार बचपन में दोस्तों के साथ शास्त्री जी गंगा नदी के पार मेला देखने गए थे। शाम को वापस लौटते समय जब सभी दोस्त नदी किनारे पहुंचे तो उन्होंने नाव के किराए के लिए जेब में हाथ डाला, तो जेब में एक पाई भी नहीं थी। वे वहीं रुक गए और उन्होंने अपने दोस्तों से कहा कि वह थोड़ी देर और मेला देखेंगे। दरअसल वे नहीं चाहते थे कि उन्हें अपने दोस्तों से नाव का किराया लेना पड़े। जब उनके दोस्त नाव में बैठकर नदी पार चले गए। जब उनकी नाव चली गई, तब शास्त्री जी ने अपने कपड़े उतारकर उन्हें सर पर लपेट लिया और नदी में उतर गए। उस समय नदी उफान पर थी, बड़े-से-बड़ा तैराक भी आधे मील चौड़े पाट को पार करने की हिम्मत नहीं कर सकता था। 

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SHASTRI JI

2. जब माली ने पीटा था- 
इसी तरह बचपन में शास्त्री जी एक बार खेल-खेल में एक माली के बाग और बच्चों के साथ फूल तोड़ने गए थे। इस दौरान माली ने बच्चों को देख लिया. 6 साल की उम्र के होने की वजह से वे पकड़े गए और माली ने उन्हें पीट दिया. शास्त्री जी ने माली से कहा कि मैं बिना बाप का बच्चा हूं इसलिए मुझे पीट रहे हो। इस पर माली ने कहा कि पिता के न होने पर तो तुम्हारी जिम्मेदारी और अधिक हो जाती है। शास्त्री जी ने इसके बाद जीवन भर अपनी जिम्मेदारियों को उठाया। शास्त्री जी जाति-प्रथा के खिलाफ थे। इस वजह से उन्होंने कभी भी अपनी जाति के सरनेम को अपने नाम में नहीं लगाया। उनके नाम के साथ लगा 'शास्त्री ' उन्हें काशी विद्यापीठ द्वारा दी गई उपाधि है।

3. सरकारी गाड़ी का पर्सनल यूज नहीं होने दिया- 

प्रधानमंत्री होने के बावजूद लाल बहादुर शास्त्री ने कभी प्रधानमंत्री को दी गई सरकारी गाड़ी का उपयोग अपने निजी काम के लिए नहीं किया। एक बार उनके बेटे ने गाड़ी का उपयोग कर लिया था तो शास्त्री जी ने खर्च को जोड़कर उतना पैसा सरकारी खजाने में जमा करवाया। आने-जाने में दिक्कत होने के कारण पत्नी के बहुत जोर देने पर लोन लेकर एक कार खरीदी थी।

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SHASTRI JI

4. फटा कुर्ता पहनकर ऊपर से कोट पहन मीटिंग में गए थे--

शास्त्री जी ने प्रधानमंत्री होते हुए अपने फटे कुर्ते पत्नी से पहनने को मांगे और कहा कि ऊपर से कोट डाल लेने के बाद यह दिखेगा भी नहीं। इसी तरह यह भी कहा जाता है कि जब शास्त्री जी 1965 के युद्ध में जीत के बाद समझौते के लिए ताशकंद जा रहे थे तो उन्होंने देखा कि उनका कोट फटा था। उनके पास नया कोट खरीदने के लिए पैसे नहीं थे और स्वाभिमानी होने की वजह से वे किसी से पैसे मांग भी नहीं सकते थे। कहा जाता है कि उन्होंने फटे कोट को रफू करवाया और वही कोट पहनकर ताशकंद में उन्होंने दुनिया के बड़े नेताओं के साथ बैठक की।

उजबेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के पश्चात 11 जनवरी सन्‌ 1966 को दिल की धड़कन रुक जाने के कारण उनका निधन हो गया। मरणोपरान्त शास्त्री जी को भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

नोट- लाल बहादुर शास्त्री जी की मौत आज भी एक पहेली है। 2009 में केंद्र सरकार ने इस संबंध में एक RTI के जवाब में कहा था कि अगर शास्त्री जी की मौत से जुड़ी घटनाओं को सार्वजनिक कर दिया जाए तो भारत के कई अंतरराष्ट्रीय संबंध खराब हो जाएंगे।

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