वो अर्थशास्त्री, जिनका हर कदम किसान और मजदूरों के लिए होता था

वो अर्थशास्त्री, जिनका हर कदम किसान और मजदूरों के लिए होता था

By: Madhu Sagar
November 14, 08:11
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New Delhi: भारत के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थे लक्ष्मीचंद जैन। इनके माता-पिता दोनों ही स्वतंत्रता सेनानी थे, यहा कारण था कि लक्ष्मीचंद में देश प्रेम की भावना जागरूक थी। राष्ट्रीय भावनाओं की बुनियाद को लेकर लक्ष्मीचंद जैन की कुछ स्मृतियाँ बेहद रोचक थी।

लक्ष्मीचंद जैन ने केवल स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं बल्कि किसानों, कारीगरों, तथा स्त्रियों के समूह तथा सरकारी कमेटियों और बोर्ड के बीच एक सेतु की भूमिका अदा की थी। 

लक्ष्मीचंद जैन का जन्म

  • लक्ष्मीचंद जैन का जन्म 13 दिसम्बर 1925 को दिल्ली में हुआ था। वह अपने ङर के चौथे बच्चे थे और सबसे बड़े थे। उनके पिता एक स्वतंत्रता सेनानी थे जिसकी वजह से लक्ष्मीचंद जैन को भी यह संस्कार मिल पाया था। आपको बता दें राष्ट्रीय भावनाओं की बुनियाद को लेकर उनकी कुछ यादें काफी रोमांचक है। एक बार बेहद किटकिटाती सर्दी में एकदम सुबह लक्ष्मीचंद के पिता उन्हें गाँधी जी की जनसभा में ले गए। इस पर गाँधी जी ने उनके पिता को डाँट लगाई कि वह ऐसे मौसम में छोटे बालक को क्यों लेकर आए.... उनके बाद लक्ष्मीचंद को गाँधी जी ने स्वयं शाल औढ़ाया और मेवे खाने को दिए। 

लक्ष्मीचंद जैन की शिक्षा

  • लक्ष्मीचंद जैन की शिक्षा 1929 में शुरु हुई। उन्होंने दिल्ली में ही पढ़ाई की। 1939 में लक्षीचंद ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कॉलेज में एडमिशन लिया। शुरू में उन्होंने मेडिकल विषयों से पढ़ाई की थी। व्यावहारिक अर्थशास्त्र पर इनकी जबरदस्त पकड़ थी। 

'भारत छोड़ो' आंदोलन का दबाव

  • भारतीय नेताओं ने ब्रिटिश सरकार से उनको दिए इस युद्ध में सहयोग के बदले स्वाधीनता की माँग की जो ब्रिटिश सरकार ने स्वीकार नहीं की। इस पर अगस्त 1942 में गाँधीजी ने अंग्रेज़ों पर 'भारत छोड़ो' का दबाव बनाया। गांधी जी के साथ लक्ष्मीचंद जैन राष्ट्रवादी छात्रों के साथ अंग्रेजों के खिलाफ संग्राम में कूद पड़े। उनकी विद्रोही गतिविधियों में विचारोत्तेक साहित्य लिखना, छापना तथा उनका वितरण करना तो था ही, वह टेलीफोन के तार काटना, तथा देसी बम बनाने जैसी कार्यवाही में भी लगे हुए थे। इन्हीं कार्यवाहियों के बीच लक्ष्मीचंद जैन तथा उनके दोस्तों के बीच यह बात चल रही थी कि अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद भारत के समाज का स्वरूप क्या होगा? 

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद लक्ष्मीचंद जैन ने अपना ग्रेजुएशन पूरा कर लिया था। इसी साल उन्हें दिल्ली कांग्रेस पार्टी की स्टूडेंट ब्रांच का उपाध्यक्ष बना दिया गया। उसी दौरान भारत में एशिया रिलेशंस कांफ्रेंस का आयोजन हुआ जिसमें लक्ष्मीचंद जैन ने सक्रिय व्यवस्थात्मक भूमिका निभाई।


आज़ादी के तुरन्त बाद इसके पहले कि लक्ष्मीचन्द किसी सार्थक योजना में जुट पाते विभाजन की त्रासदी सामने आई और वे हडसन लाइन के रिफ्यूजी कैम्प के प्रमुख व्यवस्थापक बन कर विस्थातियों की देखरेख में लग गए, लेकिन उनके दिमाग से भविष्य के काम का खाका मिटा नहीं। वे स्वतन्त्र रूप से काम कर रहे थे लेकिन कोई भी काम उठाने के पहले वे खुद से पूछते, "यहाँ गाँधी जी होते तो क्या करते...' और उसके उत्तर में उन्हें जो स्वयं सूझता, वह उसे करने लगते। जल्दी ही उन्होंने अच्छे वेतन पर युवा सिविल इंजीनियरों को नियुक्त करके उन्हें पुनर्वास काम सौंपा और खुद लोगों को रोजगार तथा ट्रेनिंग दिलाने के काम में लग गए।

1947 के अन्तिम दिनों में लक्ष्मीचद्न जैन की भेंट एक कैम्प में कमला देवी चट्टोपाध्याय से हुई। उनसे इस शरणार्थी ने पूछा, 'हमारा भविष्य क्या है...?' लक्ष्मीचंद जैन को उस पल यह एहसास किया कि यह प्रश्न तो उनके दिमाग में कभी नहीं आया था। तभी लक्ष्मीचन्द तथा कमला देवी ने मिलकर विचार-विमर्श शुरू किया कि इन शरणार्शियों को इन रिफ्यूजी कैम्पों से बाहर कि जिंदगी जीने की राह कैसे दिखाई जाए। 

1948 में जैन ने कमला देवी के साथ एक इण्डियन को-आपरेटिव यूनियन की स्थापना की और इस संख्या ने कुछ शरणार्थियों को दिल्ली से कुछ दूर छतरपुर गाँव में एक खुली जमीन पर ला बैठाया कि वह यहाँ पर खेती शुरू करें। इस प्रोजेक्ट को हाथ में लेकर जैन ने हडसन लाइन का रिफ्यूजी कैम्प दूसरों के हवाले किया और छतरपुर आ गए कि वहाँ इन लोगों को खेती के लिए, खाद, बीज तथा अन्य सहायता व सुविधा प्रदान की जा सके। इस प्रक्रिया में पण्डित नेहरू ने भी बहुत सक्रियता दिखाई। शरणार्थियों को हाथ के काम का कौशल दिया जाने लगा। 


1968 में लक्ष्मीचंद जैन ने एक कंसल्टिंग फर्म भी खड़ी की, जो किसानों तथा कारीगरों की सलाह पर सरकारी तथा गैर सरकारी काम काज में मदद करने लगी। इस तरह से लक्ष्मीचंद जैन ने किसानों, कारीगरों, तथा स्त्रियों के समूह तथा सरकारी कमेटियों और बोर्ड के बीच एक सेतु की भूमिका अदा की और इसका लाभ दोनों को मिला। लक्ष्मीचंद जैन के इस सूझबूझ भरे काम के लिए उन्हें 1989 का मैग्सेसे पुरस्कार प्रदान किया गया।लक्ष्मीचंद जैन की मृत्यु 14 नवम्बर, 2010 को हुई थी।

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