इजरायल के बच्चे पढ़ते हैं शहीद मेजर दलपत की कहानी, भारत भगत सिंह को कब बताएगा शहीद?

इजरायल के बच्चे पढ़ते हैं शहीद मेजर दलपत की कहानी, भारत भगत सिंह को कब बताएगा शहीद?

By: shailendra shukla
January 14, 14:01
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New Delhi: प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इजरायल के हाइफा शहर को मुक्त कराने में भारतीय सेना के मेजर दलपत सिंह का बहुत बड़ा योगदान है। इजरायल ने उन्हें शहीद घोषित किया लेकिन भारत सरकार भगत सिंह को आजतक शहीद घोषित करने में नाकाम रही है।

इजरायल ने शहीद मेजर दलपत सिंह की याद में हाइफा शहर में ही स्मारक बनवाया। लेकिन देश को आजाद कराने वाले भगत सिंह को भारत सरकार अभी तक शहीद का दर्जी नहीं दे पाई है। हालांकि, पंजाब के हुसैनीवाला में भगत सिंह और उनके दो अन्य साथी राजगुरू और सुखदेव की याद में 1968 में बनाए गए स्मारक पर इन्हें शहीद का दर्जा दिया गया है लेकिन केंद्र सरकार की कागजों में आज भी इन्हें शहीद नहीं माना जाता।

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दिल्ली स्थित तीन मूर्ति चौक को अब तीन मूर्ति हाइफा चौक और तीन मूर्ति हैफा मार्ग के तौर पर जाना जाएगा। इस्राइल के हैफा शहर को पहले विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों ने आजाद कराया था। इस युद्ध में कई भारतीय सैनिक मारे गए थे। तब से प्रत्येक वर्ष 23 सितंबर को भारत और इस्राइल में हाइफा डे मनाया जाता है। 

हाइफा को मुक्त कराने में शहीद हुए मेजर दलपत सिंह

हाइफा का युद्ध 23 सितंबर 1918 को लड़ा गया था। यह युद्ध प्रथम विश्व युद्ध के दौरान शांति के लिए सिनाई और फलिस्तीन के बीच चलाए जा रहे अभियान के अंतिम महीनों में लड़ा गया। इस दिन उस्मानी वंश के तुर्कों की सेनाओं को हाइफा शहर से बाहर कर दिया गया था। मेजर दलपत सिंह (एमसी) को हाइफा को मुक्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए ऐतिहासिक वृतांत में ‘हाइफा के हीरो’ के रूप में याद किया जाता है।

दलपत सिंह को उनकी बहादुरी के लिए मिलिट्री क्रास से सम्मानित किया गया था। इस वजह से इंडियन मिलिट्री प्रति वर्ष हाइफा डे को सेलिब्रेट करती है। 23 सितंबर को हुए इस युद्ध में मेजर दलपतसिंह समेत 44 हिन्दुस्तानी जवान शहीद हुए। दिल्ली स्थित तीन मूर्ति हाइफा स्मारक इसी युद्ध के शहीदों को समर्पित है। गौर करने लायक तथ्य है कि इस विजय गाथा को इजराइली बच्चे अपने स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ते हैं।

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मेजर दलपत सिंह को इजरायल ने शहीद घोषित करके उनके नाम पर स्मारक बनवा दिया। उन्होंने इजरायल के एक शहर को आजार कराने में अपनी शहादत दी थी लेकिन भारत सरकार ने भगत सिंह को आज तक शहीद का दर्जा नहीं दिया है जिन्होंने पूरे देश को आजाद कराने में अहम भूमिका निभाई थी।

हुसैनीवाला में तीनों शहीदों का स्मारक (फाइल फोटो)

वर्ष 2013 में कांग्रेस सरकार के दौरान डाली गई एक आरटीआई में इस बात का खुलासा हुआ था कि केंद्र सरकार भगत सिंह को दस्‍तावेजों में शहीद नहीं मानती। तब से भगत सिंह के वंशज शहीद भगत सिंह ब्रिगेड के बैनर तले भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को सरकारी रिकार्ड में शहीद घोषित करवाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

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मामला संसद में भी उठ चुका है लेकिन अब तक सरकार ने इस बारे में कोई निर्णय नहीं लिया है। शहीद भगत सिंह की कहानियां बच्चों को स्कूलों में पढ़ाई जाती रही है। उनके नाम के साथ शहीद जोड़ा जाता रहा है लेकिन केंद्र सरकार उन्हें शहीद मानने से इनकार करती रही है। हद तो तब हो गई जब कुछ जगहों पर पाठ्यक्रमों में भगत सिंह के नाम से पहले 'क्रांतिकारी आतंकी' शब्द जोड़ा जाता था। लेकिन विरोध के बाद इसमें बदलाव कर दिया गया। सवाल अभी भी वही है कि आखिर भारत सरकार कब भगत सिंह को शहीद घोषित करेगी?  


भगत सिंह को शहीद घोषित करने में कोई दिक्कत नहीं है:
अलीगढ़ मुस्‍लिम यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर अली अख्‍तर का कहना है कि देश का बच्‍चा-बच्‍चा जानता है कि भगत सिंह ने देश के लिए अपनी जान दे दी, फिर सरकार को शहीद घोषित करने में क्‍या दिक्‍कत हो सकती है। दरअसल सरकार को भगत सिंह से कोई सियासी फायदा नहीं होता इसलिए वह इस बारे में जज्‍बा भी नहीं दिखाती। यह दुर्भाग्‍यपूर्ण है। सरकार जब चाहे तब भगत सिंह को दस्‍तावेजों में शहीद घोषित कर सकती है, इसमें कोई तकनीकी दिक्‍कत नहीं है। भगत सिंह अंग्रेजों के लिए क्रांतिकारी आतंकी थे, हमारे लिए वह शहीद हैं लेकिन यह दुखद है कि हमारे देश के इतिहासकारों ने उनके साथ न्‍याय नहीं किया।

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