वो लेखक, जो चित्रकार भी थे, पत्रकार भी थे, जिनकी हास्य कविताएं आज भी की जाती हैं याद

वो लेखक, जो चित्रकार भी थे, पत्रकार भी थे, जिनकी हास्य कविताएं आज भी की जाती हैं याद

By: Aryan Paul
September 09, 18:09
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New Delhi:

सुकुमार राय बांग्ला भाषा के प्रसिद्ध कवि, लेखक-चित्रकार होने के साथ-साथ पत्रकार भी थे। सुकुमार बाल साहित्य के लिए आज भी याद किए जाते हैं, उनका लिखा आबोल-ताबोल बच्चे आज भी पढ़ते हैं। सुकुमार ने 90 के दौर में ब्रिटेन जाकर प्रिंटिंग और फोटोग्राफी की ट्रेनिंग ली। भारतीय फिल्मों को नई पहचान दिलाने वाले और भारत रत्न से सम्मानित सत्यजित राय के पिता हैं सुकुमार राय ।

उन्होंने बांग्ला में बच्चों के लिए आबोल-ताबोल, पांगला दासु और हयबरल जैसी फेमस कहानियां लिखी, जिनमें से आबोल-ताबोल ही उन्हें महान बनाने के लिए काफी है। 

30 अक्टूबर 1887 को कोलकाता के बंगाली परिवार में जन्मे सुकुमार राय बांग्ला भाषा के प्रसिद्ध कवि, लेखक-चित्रकार होने के साथ-साथ पत्रकार भी थे। सुकुमार बच्चों के लिए हास्य कविता और कहानियां लिखा करते थे। सुकुमार राय गुरु रवींद्रनाथ टैगोर के शिष्य थे। उनके पिता उपेंद्रनाथ राय बाल साहित्य लिखा करते थे और वे कट्टर ब्रह्मसमाजी थे। सुकुमार राय की कविताएं अपनी कल्पनाशीलता के कारण आज भी बंगाली बच्चों द्वारा पढ़ी जाती हैं। सुकुमार राय विश्व में भारतीय फ़िल्मों को नई पहचान दिलाने वाले भारत रत्न से सम्मानित सत्यजित राय के पिताजी थे।

सुकुमार राय की शादी एक मंजी हुई गायिका और दमदार आवाज की मलिका सुप्रभा से हुई थी। सुप्रभा राय रवीन्द्र संगीत की मंजी हुई गायिका थीं । सुकुमार राय की मौत उस वक्त हुई, जब उनके बेटे सत्यजित राय सिर्फ 2 साल के थे। सुकुमार राय के पुत्र सत्यजित राय, सत्यजित रे, शॉत्तोजित रॉय, जिन्हें तीन नामों पुकारा जाता था। बीसवीं शताब्दी में दुनिया की महान फ़िल्मी हस्तियों में से एक थे। सत्यजित राय प्रमुख रूप से फ़िल्मों में निर्देशक के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन लेखक और साहित्यकार के रूप में भी उन्होंने उल्लेखनीय ख्याति अर्जित की है। सत्यजित राय फ़िल्म निर्माण से संबंधित कई काम ख़ुद ही करते थे। इनमें निर्देशन, छायांकन, पटकथा, पार्श्व संगीत, कला निर्देशन, संपादन आदि शामिल है। फ़िल्मकार के अलावा वह कहानीकार, चित्रकार और फ़िल्म आलोचक भी थे। विश्व में भारतीय फ़िल्मों को नई पहचान दिलाने वाले सत्यजित राय भारत रत्न (1992) के अतिरिक्त पद्म श्री (1958), पद्म भूषण (1965), पद्म विभूषण (1976) और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार (1967) से सम्मानित हैं।

सुकुमार राय एक अच्छे लेखक होने के साथ-साथ राजनीतिक पार्टी से भी जुड़े थे। वह ब्रह्मसमाज के साथ जुड़कर सामजिक कार्य भी करते थे । उन्होंने लंबी कविताएं जैसे "Atiter Katha" बंगाली में लिखी, जो उस समय के ब्रह्मसमाज की सबसे अच्छी रचना साबित हुई। उन्होंने बच्चों को ब्रह्मसमाज से जोड़ने के लिए भी काफी काम किया। गुरु रविंद्रनाथ टैगोर के लिए भी उन्होंने कई कार्यक्रम किए । सुकुमार अपने टाइम के सबसे फेमस ब्रह्म समाज के चेहरों में से एक थे। 

सुकुमार राय के पिता उपेंद्रकिशोर ने पब्लिशिंग कंपनी खोली, जिसमें वे और सुकुमार काम करने लगे, और फिर प्रिंटिंग की बेहतर जानकारी के लिए सुकुमार ब्रिटेन चले गए।उपेंद्रकिशोर ने जमीन खरीदकर तब तक एक प्रिंटिंग प्रेस शुरू कर दिया, जिसमें हाई-क्वालिटी की कलर ब्लाकिंग यूज होने लगी। उसी दौरान उन्होंने बच्चों के लिए चिल्ड्रेन मैगजनीन छापनी शुरू कर दी, जिसका नाम था संदेश। और तब तक सुकमार ब्रिटेन से वापस आ गए। इसी दौरान उपेंद्रकिशोर की मौत हो गई और सारा बिजनेस सुकुमार को ही संभालना पड़ा ।

1906 में सुकुमार राय ने कलकता यूनिवर्सिटी से फिजिक्स और केमिस्ट्री में ग्रेजुएशन किया। इसके बाद उन्होंने ब्रिटेन के कॉलेज से फोटोग्राफी और प्रिंटिग टेक्नोलॉजी सीखी। उन्होंने भारत में फोटोग्राफी के क्षेत्र में एक नया अध्याय जोड़ दिया। उन्होंने गुरु रवींद्रनाथ के गानों पर लेक्चर भी दिए, और सुकुमार ने टैगोर नोबेल पुरस्कार भी जीता था। इस बीच सुकुमार ने एक चित्रकार के रूप में फेमस हुए । एक टेक्नोलॉजिस्ट के रूप में उन्होंने हाल्फ़ोन ब्लॉकमैकिंग के नए तरीके विकसित किए, जिसके बारे में ब्रिटेन में कई टेक्नोलॉजी आर्टिकल भी पब्लिश हुए। सुकुमार के दो लेख भी प्रकाशित हुए। 1912 में वे यूनाइटेड किंगडम के रॉयल फोटोग्राफी क्लब में शामिल हुए। 1922 में उन्हें सरकार की तरफ से फैलोशिप भी मिली । सिर्फ 35 साल की आयु में 10 सितंबर 1923 को वह दुनिया छोड़ चले ।

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