वो क्रांतिकारी जिसने वीर सावरकर को बचाने में निभाई बड़ी भूमिका, गांधी जी के बताए मार्ग पर चलीं

वो क्रांतिकारी जिसने वीर सावरकर को बचाने में निभाई बड़ी भूमिका, गांधी जी के बताए मार्ग पर चलीं

By: Aryan Paul
October 11, 18:10
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New Delhi:

क्रांतिकारी होने के साथ-साथ गांधी जी की फॉलोवर भी थीं पेरीन बेन। जिन्होंने आजादी की लड़ाई में बड़ा रोल अदा किया था। अपने आंदोलनों के चलते इन्हें 1930-32 में जेल भी जाना पड़ा था। साथ ही पेरीन बेन को मुंबई प्रदेश कांग्रेस संघर्ष समिति की प्रथम महिला अध्यक्ष बनने का गौरव भी हासिल हुआ था । बेन बाद में गांधी सेवा सेना से भी जुड़ी और उन्होंने वहां सचिव के तौर पर काम किया था । साथ ही बता दें कि पेरीन बेन दादा भाई नौरोजी की पौत्री थीं।

पेरीन बेन का जन्म 12 अक्तूबर 1888 को गुजरात के कच्छ में हुआ । उनके पिता आर्देशिर एक डॉक्टर थे और उनकी माता जी विरबाई दादिना हाउस वाइफ थीं। उनके 8 भाई-बहन थे औऱ जब वे सिर्फ 5 साल की थीं, जब उनके पिता उन्हें छोड़ गए । शुरूआती पढ़ाई उनकी मुंबई में ही हुई थी । हालांकि शुरूआती जीवन काल से ही उनमें राष्ट्रप्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी । भारत में पढ़ने के बाद आगे की शिक्षा के लिए वे फ्रांस चली गई और पेरिस में उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। देश की स्वतंत्रता के लिए लगातार काम करती रहीं। मुंबई प्रदेश कांग्रेस की संघर्ष समिति की वे प्रथम महिला अध्यक्ष थीं। 1954 में राष्ट्रपति द्वारा पेरीन बेन को पद्मश्री से सम्मानित भी किया गया था। 

पेरीन बेन पेरिस में भीखा जी कामा, लाला हरदयाल, श्यामजी कृष्ण वर्मा जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आईं और देश की स्वतंत्रता के लिए काम करने लगी थीं। पुर्तग़ाल के समुद्र तट पर जहाज़ से कूदकर वीर सावरकर को गिरफ्तारी से बचाने में वे भी शामिल थीं। 1911 में पेरीन बेन जब भारत लौटी, तो उन्हें अंग्रेजों के हाथों बड़ा अपमान सहना पड़ा। अंग्रेज़ों ने पेरिन बेन के साथ बड़ा अपमानजनक व्यवहार किया । 1919 में पेरीन बेन की महात्मा गांधी से भेंट हुईं और वे गांधी जी के बताए रास्ते पर चल पड़ीं। 

पेरीन बेन ने 1925 में एक वकील धनजीसा एस. कैप्टन से शादी की, हालांकि उनके कोई संतान नहीं थी। शादी के बाद भी उन्होंने अपनी समाज सेवा जारी रखी । पेरीन बेन ने खादी के वस्त्र अपनाए, खादी के प्रचार और हरिजन उद्धार के कार्यों में जुट गईं। स्वदेशी का प्रचार, शराब बैन और महिलाओं को संगठित करना पेरीन बेन का पसंदीदा काम था। 1930, 1932 में उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया था। 1935 में स्थापित हिन्दुस्तानी प्रचार सभा के काम में भी जुड़ी रही थीं। 17 फरवरी 1958 को पेरीन बेन का स्वर्गवास हो गया।

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