भारत का वो लेखक जिसे हिंदी का शेक्सपियर कहा जाता है, जिसकी कमाई का जरिया था सिर्फ लिखना

भारत का वो लेखक जिसे हिंदी का शेक्सपियर कहा जाता है, जिसकी कमाई का जरिया था सिर्फ लिखना

By: Aryan Paul
September 11, 17:09
0
New Delhi:

यूपी को वो महान लेखक जिसने सिर्फ 39 साल की छोटी सी उम्र में 150 से अधिक किताबें लिख डाली, वो लेखक जिसे हिंदी का शेक्सपियर कहा जाता है, जो एक बार लिखना शुरू कर देता, तो उसकी कलम बिना पूरा लिखा रुकती नहीं थी । जिसकी हिन्दी, अंग्रेज़ी, ब्रज और संस्कृत भाषा पर जबरदस्त कमांड थी। जिनका मूल नाम था, तिरूमल्लै नंबकम् वीरराघव आचार्य, लेकिन उन्होंने अपना नाम बदलकर रांगेय राघव रख लिया था। 

रांगेय राघव ने 42 उपन्यास, 11 कहानी, 12 आलोचनात्मक ग्रन्थ, 8 काव्य, 4 इतिहास, 6 समाजशास्त्र विषयक, 5 नाटक और लगभग 50 किताबें लिखी हैं। ये सारी रचनाएं उनके जीवन काल में प्रकाशित हो चुकी थीं। करीब 20 किताबें पब्लिश नहीं हो पाई थीं। उन्होंने कुछ अंग्रेज़ी साहित्य का भी अनुवाद किया, लेकिन ज्यादातर किताबें उन्होंने भारतीय संस्कृति और ऐतिहासिक जीवन पर ही लिखीं । सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख केंद्र मोहनजोदड़ो पर आधारित उनका काल्पनिक उपन्यास मुर्दों का टीला से लेकर कहानी तक में स्त्री पात्र कथा ही होती थी। साथ ही स्त्री के गंभीर विषयों को दर्शाती उनकी रचना रत्ना की बात, लोई का ताना और लखिमा की आंखें बेमिसाल है ।

17 जनवरी, 1923 को आगरा के ब्राह्मण परिवार में जन्मे रांगेय राघव, रामानुजाचार्य परम्परा के तमिल देशीय आयंगर ब्राह्मण थे। हिन्दी साहित्य का कोई भी ऐसा पार्ट नहीं है, जिस पर हिन्दी साहित्य के मास्टर डॉ. रांगेय राघव ने कुछ ना लिखा हो। उनके पिता रंगाचार्य के पूर्वज लगभग तीन सौ वर्ष पहले जयपुर और फिर भरतपुर के बयाना कस्बे में आकर रहने लगे थे, लेकिन रांगेय राघव का जन्म हिन्दी प्रदेश में हुआ। उन्हें तमिल और कन्नड़ भाषा का भी ज्ञान था। रांगेय ने अपनी पढ़ाई आगरा में की थी। सेंट जॉन्स कॉलेज से 1944 में ग्रेजुएशन और 1949 में आगरा विश्वविद्यालय से गुरु गोरखनाथ पर शोध करके उन्होंने पी.एच.डी. की थी। 

रांगेय राघव ने 13 साल की उम्र में लिखना शुरू किया। 1942 में जब बंगाल में अकाल पड़ा, तो उन्होंने एक रिपोर्ताज लिखा- तूफ़ानों के बीच। यह रिपोर्ताज हिंदी में चर्चा का विषय बना। बता दें कि रिपोर्ताज का मतलब घटना की पूरी जानकारी को साहित्य के साथ लिखने को कहा जाता है। साहित्य के अतिरिक्त चित्रकला, संगीत और पुरातत्व में उनकी विशेष रुचि थी। मात्र 39 वर्ष की आयु में कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज के अतिरिक्त आलोचना, संस्कृति और सभ्यता पर कुल मिलाकर 150 से अधिक पुस्तकें लिखीं। रांगेय राघव के कहानी-लेखन का मुख्य दौर भारतीय इतिहास की दृष्टि से बहुत हलचल-भरा रहा है। 

अपनी रचनाओं के बारे में उन्होंने लिखा है कि 1938 में उन्होंने कविताएं लिखना शुरू किया। एक दिन रंगीन आकाश को देखकर कुछ लिखा था। वह सब खो गया है और तब से  मन ने स्वीकार किया कि वे कविता कर सकते हैं। प्रेरणा कैसे हुई लिखना काफी मुश्किल है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक प्राचीन ब्राह्मण कहानियां में रांगेय राघव लिखते है कि आर्य परम्पराओं का अनेक अनार्य परम्पराओं से मिलन हुआ है। भारत की पुरातन कहानियों में उन्हें कई परम्परओं के प्रभाव मिलते हैं। महाभारत के युद्ध के बाद हिन्दू धर्म में वैष्णव और शिव चिन्तन की धारा वही और इन दोनों सम्प्रदायों ने पुरातन ब्राह्मण परम्पराओं को अपनी अपनी तरह स्वीकार किया। 

इसी कारण से वेद और उपनिषद में लिखे पौराणिक चरित्रों में बदलाव देखने को मिलता है। बाद के लेखन में हमें अधिक मानवीय भावों की छाया देखने को मिलती है। उनके बारे में कहा जाता था कि वो दोनों हाथों से रात दिन लिखते थे और उनके लिखे ढेर को देखकर समकालीन ये कयास लगाते थे कि शायद उन्हें शक्ति मिली है, नहीं तो इतने कम समय में कोई भी इतना ज़्यादा और इतना अच्छा कैसे लिख सकता है ? उन्हें हिन्दी का पहला मसिजीवी क़लमकार भी कहा जाता है जिनकी कमाई का जरिया सिर्फ़ लेखन ही था

शायद बहुत कम लोग यह जानते होंगे कि हिन्दी साहित्य का यह व्यक्तित्व तमिल भाषी था, जिसने हिन्दी साहित्य और भाषा की सेवा करके अपने बलबूते हिन्दी के शेक्सपीयर की संज्ञा पा ली । रांगेय राघव नाम के पीछे उनके व्यक्तित्व और साहित्य में आपसी तालमेल दिखाई देता है। अपने पिता रंगाचार्य के नाम से उन्होंने रांगेय स्वीकार किया और अपने स्वयं के नाम राघवाचार्य से राघव शब्द लेकर अपना नाम रांगेय राघव रख लिया। 

रांगेय राघव को सिगरेट पीने का बेहद शौक था। वह सिगरेट पीते तो केवल जानपील ही, दूसरी सिगरेट को वो हाथ तक नहीं लगाते थे। एक डिब्बी सिगरेट घंटों में खत्म हो जाती थी, उनका कमरा सिगरेट की गंध और धुएं से भरा रहता था। हिन्दी साहित्य के इस महान लेखक के लिए सिगरेट एक जरूरत बन गई थी। बिना सिगरेट पिये वह कुछ भी नहीं कर पाते थे। शायद सिगरेट पीने की यह आदत ही उनकी मौत का कारण बनी और 12 सितंबर 1962 को हिन्दी के इस योद्धा को मौत हम आपसे छीन ले गई ।

हर ताज़ा अपडेट पाने के लिए के फ़ेसबुक पेज को लाइक करें।