RSS को वो चीफ, जिसने खालिस्तान मूवमेंट को पनपने नहीं दिया, जिसने RSS में कई नए प्रयोग किए

RSS को वो चीफ, जिसने खालिस्तान मूवमेंट को पनपने नहीं दिया, जिसने RSS में कई नए प्रयोग किए

By: Aryan Paul
September 14, 17:09
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New Delhi:

RSS को भले ही कट्टर हिंदूवादी संगठन समझा जाता हो, और उनके कार्यकर्ताओं को लेकर तमाम कमेंट किए जाते हो , लेकिन एक सच यह भी है कि अब तक जितने भी RSS चीफ रहे हैं, सभी ने हायर एजुकेशन ली थी। और उन्होंने देशहित में अनेक काम किए। आज हम आपको RSS के पांचवें सरसंघचालक के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनका नाम था के.एस सुदर्शन। जिन्होंने इंजीनियरिंग में टेलीकम्युनिकेशंस में ग्रेजुएशन किया था । जिन्होंने RSS को नई ऊंचाईयों तक पहुंचाया ।

बता दें कि के.एस. सुदर्शन तमिलनाडु और कर्नाटक की सीमा पर बसे कुप्पहल्ली गांव के निवासी थे। के.एस सुदर्शन के पिता सीतारामैया वन-विभाग में नौकरी करने के कारण ज्यादातर मध्यप्रदेश में ही रहे और वहीं तब मध्यप्रदेश और अब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर जिले के एक ब्राह्मण परिवार में 18 जून, 1931 को सुदर्शन का जन्म हुआ। के.एस. सुदर्शन ने शादी नहीं की। तीन भाई और एक बहिन वाले परिवार में सुदर्शन जी सबसे बड़े थे। कन्नड़ परम्परा में सबसे पहले गांव, फिर पिता और फिर अपना नाम बोलते हैं। इसलिए उनका भी नाम इस तरह से था । वे RSS के पांचवें सरसंघचालक थे। मार्च 2009 में मोहन भागवत को छठवां सरसंघचालक नियुक्त कर अपनी मर्जी से उन्होंने पद छोड़ दिया था ।

सुदर्शन ने अपनी पढ़ाई रायपुर, दामोह, मंडला और चंद्रपुर में की। सिर्फ 9 साल की उम्र में ही उन्होंने पहली बार RSS जाना शुरू किया। 1954 में जबलपुर के सागर विश्वविद्यालय  से टेलीकम्युनिकेशंस में इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया। और सुदर्शन 23 साल की उम्र में पहली बार RSS के पूर्णकालिक प्रचारक बने। RSS में परंपरा है, कि पूर्णकालिक प्रचारक विवाह नहीं करते हैं। इसलिए इस परंपरा का पालन करते हुए सुदर्शन आजीवन अविवाहित रहे। उन्होंने अपना सारा जीवन देश और संगठन को समर्पित कर दिया। सबसे पहले उन्हें रायगढ़ भेजा गया।

सुदर्शन अनेक विषयों और भाषाओं के जानकार थे। किसी भी समस्या की गहराई तक जाकर, उसके बारे में सोचकर समस्या का हल निकालना उनकी विशेषता थी। पंजाब की खालिस्तान समस्या हो या असम की घुसपैठ या विरोधी आन्दोलन। इन सब मामलों पर उन्होंने सरकार को ठोस उपाय दिए। साथ ही संघ के कार्यकर्ताओं को उस दिशा में तैनात कर आन्दोलन को गलत दिशा में जाने से रोका। पंजाब के बारे में उनकी यह सोच थी कि हिन्दू और सिखों में कोई अंतर नहीं है। हर केशधारी हिन्दू है, हर हिन्दू दसों गुरुओं और उनकी पवित्र वाणी के प्रति आस्था रखने के कारण सिख है। उन्हीं की सोच का नतीजा था कि खालिस्तान आंदोलन अपने चरम पर होते हुए भी पंजाब में कुछ नहीं कर सका और उन्होंने पंजाब को गृहयुद्ध से बचा लिया। इससे विदेश में बैठे खालिस्तान मूवमेंट के आकाओं को सिर्फ निराशा ही हाथ लगी ।

सुदर्शन अच्छे प्रवक्ता के साथ ही अच्छे लेखक भी थे। जब भी समय मिलता, लिखने बैठ जाते, हालांकि ज्यादा बिजी होने के कारण वे कम ही लिख पाते थे। उनके कई लेख विभिन्न पत्रों ने प्रमुखता से प्रकाशित किये। सुदर्शन जी का आयुर्वेद पर गहरा विश्वास था। लगभग 20 साल पहले हार्टअटैक होने पर डॉक्टरों ने बाइपास सर्जरी को ही आखिरी इलाज बताया था, लेकिन सुदर्शन जी ने लौकी के ताजे रस के साथ तुलसी, काली मिर्च आदि के सेवन से खुद को ठीक कर लिया। कादम्बिनी के तत्कालीन सम्पादक राजेन्द्र अवस्थी सुदर्शन जी के मित्र थे। उन्होंने इस प्रयोग को दो बार कादम्बिनी में प्रकाशित किया। 

1979 में वे अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख बने। शाखा पर बौद्धिक विभाग की ओर से होने वाले दैनिक कार्यक्रम, साप्ताहिक कार्यक्रम चर्चा, कहानी, प्रार्थना अभ्यास और मंथली कार्यक्रम बौद्धिक वर्ग, समाचार समीक्षा, जिज्ञासा समाधान, गीत, के अतिरिक्त समय से होने वाली मंथली बैठकों को सुव्यवस्थित करने का काम 1979 से 1990 में उनके कार्यकाल में ही हुआ। संघ की शाखा पर होने वाले प्रातःस्मरण के स्थान पर नये एकात्मता स्तोत्र और एकात्मता मन्त्र को भी उन्होंने शुरू कराया। 1990 में उन्हें सह सरकार्यवाह की जिम्मेदारी दी गयी। देश का बुद्धिजीवी वर्ग, जो कम्युनिस्ट आन्दोलन की विफलता के कारण वैचारिक मतभेद में डूबा था। संघ-कार्य और वैश्विक हिन्दू एकता की कोशिशों की चलते उन्होंने ब्रिटेन, हालैंड, केन्या, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, हांगकांग, अमेरिका, कनाडा, त्रिनिडाड, टुबैगो, गुयाना आदि देशों का दौरा भी किया।

संघ कार्य में सरसंघचालक की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण है। चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेंद्र सिंह को जब लगा कि तबियत खराब होने के कारण वे और ज्यादा काम नहीं रह सकते, तो उन्होंने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से बातचीत कर 10 मार्च 2000 को अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में सुदर्शन जी को यह जिम्मेदारी सौंप दी। 9 साल बाद सुदर्शन जी ने भी इसी परम्परा को निभाते हुए 21 मार्च, 2009 को सरकार्यवाह मोहन भागवत को छठे सरसंघचालक का कार्यभार सौंप दिया। सुदर्शन संघ प्रमुख के पद से हटने के बाद से भोपाल में रह रहे थे और संघ के विभिन्न कार्यों में मार्गदर्शक की भूमिका में थे। डिमेंशिया से पीडि़त सुदर्शन कुछ समय से बीमार चल रहे थे और उनकी देखभाल के लिए एक अटेंडेंट रखा गया था।

के.एस सुदर्शन का 15 सितम्बर 2012 को रायपुर में दिल का दौरा पड़ने से निधन हुआ। तब वह 81 साल के थे। उस रोज वह रोज की तरह सुबह सैर करके RSS ऑफिस में आकर बैठे थे, तभी उन्हें दिल का दौरा पड़ गया। वह काफ़ी लंबे समय से बीमार चल रहे थे। डॉक्टरों ने बताया कि उन्होंने उस समय अंतिम सांस ली जब वह सुबह के समय 40 मिनट की नियमित सैर के बाद अपने कक्ष में प्राणायाम कर रहे थे। उन्होंने पूर्व सांसद गोपाल व्यास द्वारा लिखित पुस्तक सत्यमेव जयते का विमोचन 14 सितम्बर 2012 को किया था। मरने से पूर्व उन्होंने अपनी आंख माधव आई बैंक को दान में दे दी थी।

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