इस कारण मनाई जाती है उत्पन्ना एकादशी, भगवान विष्णु ने दिया था देवी एकादशी को वरदान

इस कारण मनाई जाती है उत्पन्ना एकादशी, भगवान विष्णु ने दिया था देवी एकादशी को वरदान

By: Sachin
November 13, 14:11
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New Delhi: हर साल 24 एकादशी होती है। जिसे अपने-अपने नामों से जाना जाता है। मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष के दिन पड़ने वाली एकदाशी को उत्पन्ना एकादशी के रुप में मनाया जाता है। इस दिन एकादशी माता का जन्म हुआ था। जिसे उत्पन्ना एकादशी के रुप में मनाया जाता है। इस बार उत्पन्ना एकादशी 14 नवंबर, मंगलवार को है।

एकादशी का व्रत नित्य और काम्य दोनों है। नित्य का मतलब है, जो व्रत गृहस्थ के लिए करना जरूरी हो और काम्य व्रत का मतलब है- जो किसी वांछित वस्तु की प्राप्ति, यानी कि जो ऐश्वर्य, संतति, स्वर्ग, मोक्ष की प्राप्ति के लिये किया जाये। जानिए आखिर एस एकादशी का नाम उत्पन्ना एकादशी क्यों पड़ा। इसके पीछे क्या है पौराणिक कथा।

माना जाता है कि इसी दिन एकादशी माता का जन्म हुआ। इसी वजह से इसे उत्पन्ना एकदाशी कहा जाता है। इस दिन स्वयं भगवान विष्णु ने माता एकादशी को आशीर्वाद में इस दिन को एक महान व्रत और पूजा का वरदान दिया। प्रति माह दो एकादशी का महत्व पुराणों में बताया गया है। सभी का फल एक समान और उत्तम होता है।

उत्पन्ना एकादशी का व्रत रखने से मानव जाति के पहले और वर्तमान दोनों पाप मिट जाते हैं, जो भक्तजन हर महीने आने वाली एकादशी का व्रत शुरू करना चाहते हैं वे लोग उत्पन्ना एकादशी से ही अपने एकादशी के व्रत की शुरुआत करते हैं। उत्पन्ना एकादशी के दिन विष्णु भगवान ने राक्षस मुरसुरा को मारा था, उसके बाद से उनकी जीत की खुशी में इस एकादशी को मनाया जाता है। उत्तर भारत में यह एकादशी मार्गशीर्ष में जबकि आंध्रप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र में उत्पन्ना एकादशी कार्तिक मास में ही आती है।

व्रत कथा
सतयुग के समय एक महाबलशाली राक्षस था, जिसका नाम मुर था। उसने अपनी शक्ति से स्वर्ग लोग को जीत लिया था, उसके पराक्रम के आगे इंद्र देव, वायुदेव, अग्निदेव कोई भी नहीं टिक पाए थे, जिस कारण उन सभी को जीवन यापन के लिए मृत्युलोक जाना पड़ा। हताश होकर इंद्रदेव कैलाश गए और भोलेनाथ के सामने अपने दुख और तकलीफ का वर्णन किया, प्रार्थना की कि वे उन्हें इस परेशानी से बाहर निकालें। भगवान शिव ने उन्हें विष्णु के पास जाने की सलाह दी।

उनकी सलाह पर सभी देवता क्षीरसागर पहुंचे, जहां विष्णु जी निद्रा में थे। सभी ने इंतजार किया, कुछ समय बाद विष्णुजी के नेत्र खुले तब सभी देवताओं ने उनकी स्तुति की। विष्णु जी ने उनसे क्षीरसागर आने का कारण पूछा, तब इंद्र देव ने उन्हें विस्तार से बताया कि किस तरह मुर नामक राक्षस ने सभी देवताओं को मृत्युलोक में जाने के लिए विवश कर दिया। सारा वृत्तांत सुन विष्णुजी ने कहा ऐसा कौन बलशाली हैं, जिसके सामने देवता नहीं टिक पाए। तब इंद्र ने राक्षस के बारे में विस्तार से बताया कि इस राक्षस का नाम मुर हैं, उसके पिता का नाम नाड़ी जंग है और यह ब्रह्मवंशज है। उसकी नगरी का नाम चंद्रावती है, उसने अपने बल से सभी देवताओं को हरा दिया है और उनका कार्य स्वयं करने लगा है, वही सूर्य है, वही मेघ और वही हवा और वर्षा का जल...। उससे हमें मुक्ति दिलाएं।

सुनकर विष्णु ने इंद्र को आश्वासन दिया कि वो उन्हें इस विपत्ति से निकालेंगे। इस प्रकार विष्णु जी मुर दैत्य से युद्ध करने उसकी नगरी चंद्रावती जाते हैं। मुर और विष्णु के मध्य युद्ध प्रारंभ होता है। कई वर्षों तक युद्ध चलता रहता है। भगवान विष्णु को नींद आने लगी तो वे बद्रिकाश्रम में हेमवती नामक गुफा में विश्राम करने चले गए। मुर भी उनके पीछे घुसा और सोते हुए भगवान को मारने के लिए बढ़ा तो अंदर से एक सुंदर कन्या निकली और उसने मुर से युद्ध किया। घमासान युद्ध में मुर मूर्छित हो गया और बाद में उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया गया।

जब विष्णु की नींद टूटी तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि यह कैसे हुआ और किसने किया? कन्या ने सब विस्तार से बताया। वृत्तांत जानकर विष्णु ने कन्या को वरदान मांगने के लिए कहा। कन्या ने मांगा कि 'मुझे ऐसा वर दें कि अगर कोई मनुष्य मेरा उपवास करे तो उसके सारे पापों का नाश हो और उसे विष्णुलोक मिले।' तब भगवान ने उस कन्या को एकादशी नाम दिया और वरदान दिया कि इस व्रत के पालन से मनुष्य जाति के पापों का नाश होगा और उन्हें विष्णु लोक मिलेगा। तब से एकादशी व्रत प्रारंभ हुआ तभी से एकादशी को परंपरा में इतना महत्व दिया गया।

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