दैवीय चमत्कार, 50 लाख लीटर पानी से भी नहीं भरता शीतला माता के मंदिर में स्थित ये छोटा सा घड़ा

दैवीय चमत्कार, 50 लाख लीटर पानी से भी नहीं भरता शीतला माता के मंदिर में स्थित ये छोटा सा घड़ा

By: Sachin
September 12, 21:09
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New Delhi: भारत में जितनी परंपराएं हैं, उससे जुड़ी उतनी ही पौराणिक कथाएं भी हैं। इनमें से कई का वर्णन पुराणों और ग्रंथों में मिलता है। ऐसी ही एक चमत्कारिक घटना राजस्थान के पाली जिले में देखने को मिलती है।

यहां स्थित शीतला माता के मंदिर का इतिहास 800 साल पुराना है। पाली के बाटुंद गांव में एक अत्यंत प्राचीन शीतला माता का मंदिर है। मंदिर के मध्य में एक आधा फीट का गहरा गड्ढा है। जिसे साल में केवल दो बार श्रद्धालुओं के दर्शन के लिये खोला जाता है। पहला शीतला सप्तमी पर और दूसरा ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा पर। 

यह गड्ढा कोई साधारण नहीं, बल्कि चमत्कारिक माना जाता है। मान्यता के अनुसार, करीब 800 साल से यह परंपरा चली आ रही है कि गांव की सभी महिलाएं मटके भरकर इस गड्ढे में पानी भरती हैं। बावजूद इसके गड्ढा कभी भी भरता नहीं है। साथ ही गड्ढे से पानी कहीं बाहर नहीं निकलता है।

ग्रामीणों के अनुसार करीब 800 साल से गांव में यह परंपरा चल रही है। घड़े से पत्थर साल में दो बार हटाया जाता है। पहला शीतला सप्तमी पर और दूसरा ज्येष्ठ माह की पूनम पर। दोनों मौकों पर गांव की महिलाएं इसमें कलश भर-भरकर हज़ारो लीटर पानी डालती हैं, लेकिन घड़ा नहीं भरता है।

अंत में जैसे ही पुजारी मां शीतला के चरणों को छूकर दूध उस गड्ढे में भरता है, वह पूरा भर जाता है। गांव में इस दिन मेला लगता है और दूर-दूर से लोग इस चमत्कार को देखने आते हैं।

ग्रामीणों के अनुसार, गांव में लगभग 800 साल पहले बाबरा नाम का राक्षस रहता था। गांव में किसी की भी शादी होती थी, विदाई के वक्त राक्षस दूल्हे को मार देता था। राक्षस के आतंक से ग्रामीण परेशान थे।

समस्या से निपटने के लिये ब्राह्मणों ने शीतला माता की उपासना की और घोर तपस्या की। बताया जाता है कि शीतला माता गांव के एक ब्राह्मण के सपने में आई। उन्होंने बताया कि जब उसकी बेटी की शादी होगी तब वह राक्षस को मार देगी। शादी के समय शीतला माता एक छोटी कन्या के रूप में मौजूद थीं और वहीं पर उस राक्षस का अंत किया।

मरते वक्त राक्षस ने शीतला माता से साल में एक बार बलि की मांग की, जिसे उन्होंने मना कर दिया। माता ने राक्षस को आशीर्वाद देते हुए कहा कि साल में दो बार गांव की महिलाएं पानी जरूर पिलाएंगी। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। गड्ढे से आखिर पानी क्यों बाहर नहीं आता, इस पर वैज्ञानिक शोध भी हुए, लेकिन अब तक कोई सफलता हाथ नहीं लगी है।

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