Black Death : एक ऐसी महामारी जिसने यूरोप के लोगों से छीन ली थी 50 लाख जिंदगी

New Delhi : अमेरिका में हर मिनट दो मिनट पर किसी की जान जा रही है। यही हाल स्पेन और इंग्लैंड का भी है। कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में तहलका मचा रखा है। खासकर यूरोप और अमेरिका में। कब्रिस्तानों में जगह कम पड़ गए हैं। एक साथ कई जगहों पर सैकड़ों पार्थिव शरीर को रखा जा रहा है। दृश्य दहला देनेवाला है।
और यह कल्पना नहीं हकीकत है। भयानक हकीकत। चीखों को चीरती हकीकत। लेकिन दुनिया में यह पहली बार नहीं है जब चारों ओर सिर्फ चीख सुनाई दे रही हों। दुनिया के इतिहास में ऐसी कई काली रातें दर्ज हैं। तब भी सिर्फ चीख पुकार थी, जो बार-बार आई। जब भी आई अपने साथ लाखों को ले गई। क्या बच्चे क्या बूढे और क्या जवान, जिसने भी दिन का सूरज देखा, वो रात का चांद देखने से पहले ही दुनिया से अलविदा कर ​गया। इतिहास में उस भयावह घटना को ‘ब्लैक डेथ’ का नाम दिया गया, जिसने देखते ही देखते यूरोप की आधी आबादी को हमेशा के लिये नींद में सुला दिया और फिर एशिया और अफ्रीका में अपना कहर बरपाते हुए अचानक खत्म हो गई। हमारे पुरखों ने वो दौर देखा और अब हम यह दौर देख रहे हैं।

जिस आधुनिक यूरोप को आज हम कोरोना की वजह से रोता बिलखता देख पा रहे हैं, उसकी स्थिति 13वीं शताब्दी में अफ्रीकी देशों से ज्यादा अच्छी नहीं थी। यहां के लोगों के पास रोजगार के साधन सीमित थे और ज्यादातर जनसंख्या खेती पर निर्भर थी। आर्थिक स्थिति लगभग एशियाई देशों के जैसी ही थी। जैसे-तैसे करके यहां लोगों का गुजारा हो रहा था। शिक्षा का आभाव और स्वास्थ्य के प्रति चेतना न होने के कारण मेडिकल सुविधाओं पर काम नहीं किया गया था। प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए यूरोप की जनता केवल ईश्वर पर निर्भर थी। वे चर्च जाते, प्रेयर करते और यह काफी नहीं होता, तो तंत्र का सहारा लेते पर दवाओं से उनका सरोकार नहीं हुआ था।
1315 में यूरोप के मौसम में बदलाव आना शुरू हुई, जिसका सीधा असर वहां के जनता के स्वास्थ्य पर हुआ। इसी का दूसरा बुरा असर खेती पर भी हो रहा था। देश में आबादी लगातार बढ़ रही थी। नतीजतन कुछ ही समय में यहां खाद्यान संकट पैदा हो गया। मौसम के बदलाव के कारण जिस समय बारिश नही होनी चाहिए उस वक्त भीषण बारिश हुई, ओले गिरे और फसलें खराब हो गईं। सर्दियों का मौसम एक बार आया तो फिर लंबे समय तक नहीं गया। जिससे धीरे-धीरे धरती बंजर होने लगी। ऐसा वक्त भी आया, जब अनाज की कीमतें 300 गुना बढ़ गईं। पुरूष अपने भूखे बच्चों के लिए हिंसा पर उतार आए।
अनाज का एक बोरा पाने के लिए लोग एक-दूसरे का खून बहाने तक के लिए तैयार थे। जो असहाय थे पर भुखमरी में मर रहे थे। इस त्रासदी से उभरने में यूरोप को कम से कम 50 साल लगने वाले थे। जनता ने साहस दिखाया और इन भीषण परिस्थितियों से निकलने की कोशिश जारी रखी। धीरे-धीरे साल गुजरने लगे और सब कुछ पटरी पर आ रहा था। पर तब कोई नहीं जानता था कि इससे भी बड़ी त्रासदी उनकी इंतजार कर रही है।

जब ‘ब्लैक डेथ’ ने दी दस्तक : साल 1347, महीना अक्टूबर, तारीख इतिहास में दर्ज नहीं है, पर फिर भी न भूलने वाला दिन। यूरोप की हवा आम दिनों की तरह ही खुशनुमा थी। लोग अपने रोजमर्रा के कामों में लगे थे। जिंदगी फिर से पटरी पर दौड़ने की तैयारी कर रही थी। वहीं कुछ लोगों को इंतजार था अपनों के आने का। इसी इंतजार के साथ लोग सिसली बंदगाह पर खड़े हुए थे। दरअसल यहां कुछ व्यापारिक जहाज लौट रहे थे और इन जहाजों पर गए कामगारों के परिवार वाले उत्सुकता के साथ उनका इंतजार कर रहे थे। सुबह होते-होते तक जहाज बंदरगाह के तट पर आने लगे। एक के बाद एक आधा दर्जन जहाज जमा हो गए। लोग उत्सुकतापूर्वक जहाजों के दरवाजों को तांक रहे थे, पर उस ओर से कोई हलचल नहीं हुई।
काफी देर तक जहाज से कोई नहीं उतरा था। भीड़ में से किसी ने हिम्मत करके जहाज पर कदम रखा। वहां का नजारा खौफनाक था। जहाज पर हर तरफ बेजान शरीर पड़े थे। इस ढेर के नीचे कुछ जिंदा लोग अब भी आखिरी सांसे गिन रहे थे।
जहाज के कप्तान किसी तरह नाविकों को उनके घर तो ले आए थे पर कोई सलामत नहीं बचा था। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। सभी ने एक-एक कर सबको नीचे उतारा। जिंदा बचे हुए लोगों को राहत शिविरों में लाया गया। हर तरफ चीख पुकार मच गई। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या है। लोगों के शरीर धीरे-धीरे काले पड़ रहे थे, जिसे जो समझ में आया वह कोशिश करने लगा। दफनाने के लिए जमीन की खुदाई शुरू हुई। इस काम में सुबह से शाम हो गई।
पूरा शहर बेहाल था। लोग थक कर दुखी मन के साथ बैठे हुए थे कि कुछ ही देर में कुछ और लोगों की तबियत खराब होने की सूचना मिली। ये वे लोग थे, जो जहाज पर नहीं गए थे। बल्कि उन मरीजों की सेवा कर रहे थे, जो जहाज से उतरे थे। देखते ही देखते कई लोग बीमार होने लगे। चारों ओर चीखें गूंज उठी। कोई कुछ समझ पाता इसके पहले ही ईश्वर ने उन्हें अपने पास बुला लिया।

समस्या का समाधान तब हो सकता था, जब यह पता चल पाए कि समस्या की जड़ कहां है। लेकिन उन हालातों में यह भी संभव नही था। बाद में हुई शोधों में पता चला कि प्लेग की महामारी चीन से होते हुए यूरोप पहुंची थी। दरअसल चीन में प्लेग की शुरुआत हुई थी। 1340 के बाद चीन में एक बार​ फिर प्लेग ने दस्तक दी। किन्तु, यह कहर केवल चीन की सीमा तक नहीं था, बल्कि आगे बढ़ रहा था। दरअसल व्यापार की सहूलियत के लिहास से एशिया, दक्षिण ​एशिया, मध्य एशिया के बीच संपर्क स्थापित करने के लिए थल और जल मार्ग विकसित किए गए थे। क्योंकि सबसे पहले सिल्क का व्यापार शुरू हुआ, इसलिए इस मार्ग का नाम ‘सिल्क रोड’ दिया गया।
1346 में यूरोप के जहाज चीन पहुंचे थे। उस वक्त यहां प्लेग का कहर था और इस कहर से प्रभावित काले चूहे जहाज में सामानों के साथ सवार हो गए। यूरोपीय ​व्यापारी नहीं जानते थे कि वे चूहों के साथ प्लेग के संक्रमण को भी साथ ले जा रहे हैं। सबसे पहले यूक्रेन के क्रीमिया में पहुंचे जहाजों में चूहों ने प्रवेश किया। जहाज वापिस अपने देश जाने के लिए निकल पड़े। यह मार्ग कई हफ्तों का था। इस बीच हवा के संपर्क में आते ही प्लेग का संक्रमण जहाज पर सवार लोगों में भी फैलने लगा। धीरे-धीरे जहाज पर सवार नाविकों ने दम तोड़ना शुरू कर दिया। ये वही जहाज थे, जो 1347 में सिसली बंदगाह पहुंचे थे। फिर जैसे-जैसे लोग संक्रामक व्यक्ति के संपर्क में आते गए वैसे-वैसे उनकी हालत खराब होने लगी। ठीक वैसे ही जैसे इस बार कोरोना में हुआ है। कुछ ही हफ्तों में प्लेग एक शहर से दूसरे शहर और फिर गांव-कस्बों में फैल गया। 8 महीनों के भीतर ही प्लेग ने अफ्रीका, इटली, स्पेन, इंग्लैंड, फ्रांस, आस्ट्रिया, हंगरी, स्विट्‌ज़रलैंड, जर्मनी, स्कैन्डिनेविया और बॉल्टिक श्रेत्र को अपनी चपेट में ले लिया था।
आलम यह था कि लोग महामारी के डर से घर से बाहर ​नहीं निकल पा रहे थे। दुकानें और व्यापार बंद हो गया। पुजारियों ने संकट की घड़ी में प्रर्थना करने की सलाह दी। समस्या तब विकराल हो गई जब अंतिम संस्कार करने वाला कोई नहीं बचा। इंसान तो इंसान जानवरों ने भी दम तोडना शुरू कर दिया था। जिनकी जान गई उनका आंकड़ा पहले हजार हुआ फिर 10 हजार फिर 50 हजार और यह संख्या बढ़ते बढ़ते लाखों में तब्दील हो गई। एक अनुमान के मुताबिक 1350 तक प्लेग के कहर से यूरोप की 40 फीसदी आबादी काल के मुंह में समा चुकी थी। एशिया और अफ्रीका में भी आंकड़ा 25 लाख के पार पहुंच गया।
करीब 3 साल और बीत चुके थे। मौसम में बदलाव आना शुरू हो गया था और उसी के असर से संक्रमण का असर कमजोर होने लगा। प्लेग का कहर रुक गया था। लोगों ने राहत की सांस ली, पर अब तक काल के मुंह में समा जानेवालों का आंकड़ा 50 लाख के पार था।
प्लेग महामारी थी और उसका कोई इलाज नहीं मिल रहा था। यहां तक कि कोई यह भी नहीं जानता था कि महामारी से बचने के लिए क्या करना चाहिए? ऐसे में यह धरणा पैदा होने लगी कि ईश्वर हमसे खफा है और इसलिए वह कहर बरपा रहे हैं। रोमन कैथोलिक धर्म की शोधन-स्थान या परगेट्री की शिक्षा ने इस धारणा को मजबूत बना दिया। इसके बाद लोगों ने प्लेग को ईश्वर का कहर ही माना। नतीजा यह हुआ कि चारों ओर अंधविश्वास का माहौल बनने लगा। फिलिप ज़ीग्लर ने अपनी किताब – द ब्लैक डेथ, में कहा है कि लोगों को उनके अपने विश्‍वास ने ही बर्बाद कर डाला था। यूरोप में दो किस्म का प्लेग फैला था। पहला था न्यूमौनिक। जिसमें तेज़ बुखार और खून की उलटी होती है और तीन दिन के अंदर मरीज की जान चली जाती है।

दूसरा था ब्यूबौनिक। जिसमें मरीज की जाँघों के जोड़ और बगल में गिलटी निकल आती है जिसमें पस भर जाता और पांच दिन में मौत हो जाती। दूसरी किस्म के प्लेग से सबसे ज्यादा जान गई। चूंकि बेहतर भोजन न मिलनें के कारण यूरोप की जनता की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर थी इसलिए वे जल्दी इसकी चपेट में आ रहे थे। अंधविश्वास के कारण लोग चर्च पहुंचने लगे। प्रार्थनाएं होने लगी जब इससे फायदा नहीं हुआ तो तंत्र साधना की मदद ली गई। इससे प्लेग तो ठीक नहीं हुआ पर कुछ लोग धनी बन गए। इस महामारी को खत्म होने में पाँच साल लगे। एक बार नहीं बल्कि रूक रूककर प्लेग का कहर सदी के अंत तक चार पांच बार आया। उस दौरान यूरोप का माहौल पहले विश्‍वयुद्ध से ज्यादा भयावह था। आबादी कम होने से मजदूरों की संख्या कम हो गई। रोजगार के अवसर लगभग खत्म हो गए।
चर्च में प्रार्थना से कोई लाभ नहीं हुआ, तो लोगों का ईश्वर पर से भरोसा उठने लगा। इस विषय में ‘द ब्लैक डेथ’ किताब में लिखा है कि इस दौर में एक अलग ही पंथ का निर्माण हुआ, जिसे कोड़े मारनेवाला पंथ कहा गया। इसमें 800,000 सदस्य थे! ये सदस्य सरेआम खुद को कोड़े लगाते थे। मिडिवल हियरसी ने अपनी किताब में लिखा है कि इन पंथियों का मानना था कि चर्च में ताकत नहीं है। पोप ने इस पंथ का विरोध किया पर लोगों में काफी मशहूर हुए क्योंकि ये खुद को तकलीफ देते थे। उनका मत था कि ईश्वर हमसे खफा हैं, इसलिए हमें भी वही यातना झेलनी होगी जो ईश्वर ने झेली।

1894 में फ्राँसीसी जीवाणु-विज्ञानी आलॆक्सान्द्रे यरसन ने प्लेग फैलाने वाले बैक्टीरिया का पता लगाया। इस बैक्टीरिया का नाम यरसिनया पेस्टिस रखा गया। इसके बाद 1898 में फ्राँसीसी पॉल-लुई सीमॉन ने बताया कि प्लेग चूहे और गिलहरी जैसे छोटे-छोटे जानवरों में पाए वाले पिस्सू से फैलता है। इन खोजों के बाद प्लेग की रोकथाम के लिए वैक्सीन तैयार किए गए। किन्तु, राहत आज भी नहीं है, क्योंकि प्लेग का कहर रुका था खत्म नहीं हुआ था। वैक्सीन बनने के बाद भी 1910 में मन्चूरिया में करीब 50,000 लोगों की जान प्लेग से गई थी। WHO की रिपोर्ट कहती है कि प्लेग धरती से खत्म नहीं हुआ है। आज भी रह-रहकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में प्लेग से जान जाती रहती है। शाकलीन ब्रॉसले और ऑन्री मोलारे ने ‘पुर्कवा ला पेस्ट? ला रा, ला पीउस ए ला ब्यूबॉन’ नाम से एक किताब लिखी है, जिसमें उन्होंने कहा कि दुःख की बात है कि​ जिस प्लेग ने मध्य युगों में यूरोप में दहशत और बर्बादी फैलाई थी, भविष्य में भी इंसानों के लिए खतरा है।

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