1971 इंडो-पाक वार: भावुक पाक जनरल नियाजी बोले, ‘कौन कह रहा है कि मैं हथियार डाल रहा हूं?’

1971 इंडो-पाक वार: भावुक पाक जनरल नियाजी बोले, ‘कौन कह रहा है कि मैं हथियार डाल रहा हूं?’

By: shailendra shukla
December 06, 18:12
0
New Delhi: किसी भी सैनिक के लिए वह पल बेहद दुखद होता है जब वह दुश्मन के सामने घुटने टेक रहा हो। इस पल को जीने से बेहतर होता है कि सैनिक अपनी जिंदगी खत्म कर ले।

1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तानी सेना के लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी को ऐसा करने का मौका ही नहीं ला था। इतना ही नहीं जब उन्हें सरेंडर प्रक्रिया के लिए कहा गया तो उनके पास उनकी रिवल्वर तक नहीं थी। भारतीय सैन्य अधिकारियों ने उन्हें रिवाल्वर दिया था जिसे उन्होंने सरेंडर किया था।  

इसे भी पढ़ें-

1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध: 13 दिन, 8 हीरो और 93, 000 पाकिस्तानी सैनिकों का सरेंडर!

जब भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जेएफआर जैकब पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय पहुँचें। तो उन्होंने देखा जनरल नागरा नियाज़ी के गले में बाँहें डाले हुए एक सोफ़े पर बैठे हुए हैं और पंजाबी में उन्हें चुटकुले सुना रहे हैं।

इन तस्वीरों को देखकर आज भी रोते होंगे नियाजी!

कौन कह रहा है कि मैं हथियार डाल रहा हूं...!
 

जैकब ने नियाज़ी को आत्मसमर्पण की शर्तें पढ़ कर सुनाई। नियाज़ी की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने कहा, "कौन कह रहा है कि मैं हथियार डाल रहा हूँ।"

जैकब ने कहा- मैं आपको फ़ैसला लेने के लिए तीस मिनट का समय देता हूँ। अगर आप समर्पण नहीं करते तो मैं ढाका पर बमबारी दोबारा शुरू करने का आदेश दे दूँगा।

अंदर ही अंदर जैकब की हालत ख़राब हो रही थी। नियाज़ी के पास ढाका में 26400 सैनिक थे जबकि भारत के पास सिर्फ़ 3000 सैनिक और वह भी ढाका से तीस किलोमीटर दूर ! जनरल अरोड़ा अपने दलबदल समेत एक दो घंटे में ढाका लैंड करने वाले थे और युद्ध विराम भी जल्द ख़त्म होने वाला था। जैकब के हाथ में कुछ भी नहीं था।

कुछ नहीं बोले नियाजी
 

30 मिनट बाद जैकब जब नियाज़ी के कमरे में घुसे तो वहाँ सन्नाटा छाया हुआ था। आत्म समर्पण का दस्तावेज़ मेज़ पर रखा हुआ था। जैकब ने नियाज़ी से पूछा क्या वह समर्पण स्वीकार करते हैं? नियाज़ी ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने यह सवाल तीन बार दोहराया। नियाज़ी फिर भी चुप रहे। जैकब ने दस्तावेज़ को उठाया और हवा में हिला कर कहा, ‘आई टेक इट एज़ एक्सेप्टेड।’

लेफ्टिनेंट जेएफआर जैकब (दाईं तरफ), पाक जनरल नियाजी (बीच में समर्पण पत्र पर दस्तखत करते हुए)

नियाज़ी फिर रोने लगे। जैकब नियाज़ी को फिर कोने में ले गए और उन्हें बताया कि समर्पण रेस कोर्स मैदान में होगा। नियाज़ी ने इसका सख़्त विरोध किया। इस बात पर भी असमंजस था कि नियाज़ी समर्पण किस चीज़ का करेंगे।

मेजर जनरल गांधर्व नागरा (रिटायर्ड)

मेजर जनरल गंधर्व नागरा ने एक साक्षात्कार में बताया था, "जैकब मुझसे कहने लगे कि इसको मनाओ कि यह कुछ तो सरेंडर करें। तो फिर मैंने नियाज़ी को एक साइड में ले जा कर कहा कि अब्दुल्ला तुम एक तलवार सरेंडर करो, तो वह कहने लगे पाकिस्तानी सेना में तलवार रखने का रिवाज नहीं है। तो फिर मैंने कहा कि तुम सरेंडर क्या करोगे? तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है। लगता है तुम्हारी पेटी उतारनी पड़ेगी... या टोपी उतारनी पड़ेगी, जो ठीक नहीं लगेगा। फिर मैंने ही सलाह दी कि तुम एक पिस्टल लगाओ ओर पिस्टल उतार कर सरेंडर कर देना।"
 

इसे भी पढ़ें-

लोंगेवाला युद्ध: ना’पाक के 3,000 बम नहीं पहुंचा पाए इस मंदिर को नुकसान!

अरोडा और नियाज़ी एक मेज़ के सामने बैठे और दोनों ने आत्म समर्पण के दस्तवेज़ पर हस्ताक्षर किए। नियाज़ी ने अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया। नियाज़ी की आँखें एक बार फिर नम हो आईं।

सरेंडर प्रक्रिया के लिए जाते पाकिस्तानी ले. जनरल एएके नियाजी

अँधेरा हो रहा था! वहाँ पर मौजूद भीड़ चिल्लाने लगी। वह लोग नियाज़ी के ख़ून के प्यासे हो रहे थे। भारतीय सेना के वरिष्ठ अफ़सरों ने नियाज़ी के चारों तरफ़ घेरा बना दिया और उनको एक जीप में बैठा कर एक सुरक्षित जगह ले गए।

हर ताज़ा अपडेट पाने के लिए के फ़ेसबुक पेज को लाइक करें।