बाढ़ से बेबस हुआ बिहार- गर्भवती को बचा लेने के इस जुगाड़ ने बिहार को फिर से शर्मसार कर दिया है

New Delhi : यह जीने का जज्बा ही है जो अथाह बाढ़ में लोगों को जैसे तैसे जिंदा रखे हुये है। वरना सरकार ने तो कोई कसर नहीं छोड़ी है कि आप जीने की आस छोड़ दें। पूरे उत्तर बिहार में हालात एक जैसे हैं। दशकों से बाढ़ नियंत्रण के नाम पर हजारों करोड़ खर्च देनेवाली सरकार आज लोगों के बीच नहीं है। न ही सरकारी व्यवस्था। न पुल, न पुलिया, न सड़क, न पगडंडी। सबकुछ बाढ़ के पानी में गायब हो गये हैं। जानवर बह गये। मवेशी बह गये। इंसान बचें हैं तो सिर्फ जज्बा है जिंदा रहने का।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद नेता तेजस्वी यादव ने कुछ ऐसी ही एक तस्वीर शेयर की है बिहार की। इस तस्वीर में कुछ नजर आ रहा है तो वो है लोगों की लाचारी। एक बूढ़ी बेबस मां और एक गर्भवती को भविष्य बचा लेने की चिंता। यह तस्वीर विभीषिका की है। इंसानों के जिंदा रहने की जीजिविषा की भी और सालों साल से बिहार की जनता के साथ बेशर्मी का खेल खेल रही राजनेताओं के राजनीति के दुर्गंध की।
तेजस्वी ने ट्वीट किया है- बिहार में बाढ़ से हाहाकार है। लोग त्राहिमाम हैं। देखिये, दरभंगा ज़िले के असराहा गाँव में एक गर्भवती महिला को उनके परिजन कैसे जुगाड़ के नाव से अस्पताल ले जा रहे हैं। ये छवियाँ 15 वर्षीय विज्ञापनी सुशासन और कागजी विकास की पोल खोल रही है। यह वीडियो नीतीश कुमार के 15 वर्षों की स्वास्थ्य व्यवस्था, कटाव और बाढ़ नियंत्रण, आधारभूत संरचनात्मक विकास और आपदा प्रबंधन की धज्जियाँ उड़ा रहा है। सभी विभागों का बजट इनके संगठित भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता है। युवा साथियों से आग्रहपूर्वक निवेदन है कि आख़िर कब तक हमारा बिहार ऐसे ही चलेगा। अब समय है बदलाव का, विकसित बिहार का।

यह तस्वीर दिखाकर तेजस्वी अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं। लेकिन ये नहीं बता रहे कि तार-तार बिहार की परतों का एक हिस्सा का कर्जदार उनकी पार्टी राजद और उनका परिवार भी है। वे खुद भी तो शासन में रहे। क्या बदलाव किया? एक छोटा बदलाव ही बताते। क्या करोगे यही बताते। लेकिन नहीं, काम नहीं बताना है। काम नहीं करना है। बस चमकानी है राजनीति।

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